जुवैनाइल एक्ट

प्रस्तावना :
जुवैनाइल से मंतव्य उस किशोर अथवा बालक से है, जिसने अभी 18 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है। अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत भी 18 वर्ष से कम आयु वर्ग के इंसान को बालक माना ही गया है तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुरूप ही इस परिभाषा व अर्थ को सम्पूर्ण संसार ने आत्मसात् कर लिया है।
विश्वविख्यात बाल मनोवैज्ञानिक ‘होराल्ड सी हलबर्ट’ कहते हैं- “बालक के लिए प्रेम अत्यंत आवश्यक है, प्रमुखतः उस अवस्था में, जब वह इसका सम्पूर्ण रूप से हकदार होता है।” उनके अनुसार ‘एक बालक जन्म के समय मासूम होता है। वह अपने वातावरण के आधार पर ही सही या गलत मार्ग का चयन करता है। अतः उसकी इस अबोधता को समझते हुए, उसके द्वारा किए गए अपराध को क्षम्य मानते हुए उसके उपचार की आवश्यकता है।’ इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए आपराधिक विधियों में जुवैनाइल एक्ट की आवश्यकता महसूस की गई।
जुवैनाइल एक्ट का इतिहास :
संयुक्त राष्ट्र संघ ने बीजिंग एक्ट-1985 तथा रियाद एक्ट इत्यादि के आधार पर वर्ष 1989 में जुवैनाइल अधिकार एक्ट लागू कर दिया।
भारत में प्रथमतः
वर्ष 1986 में इस एक्ट को प्रारम्भ किया गया था। वर्ष 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ के एक्ट को भी आत्मसात् कर लिया गया, परंतु समय-समय पर इनमें आवश्यक परिवर्तन भी होता आया है।
जुवैनाइल एक्ट का विकास क्रम:
जुवेनाइल एक्ट-1986 जुवेनाइल जस्टिस बिल वर्ष 1986 में संसद के दोनों सदनों में पास किया गया तदुपरांत ‘जुवैनाइल जस्टिस एक्ट-1986’ (धारा-53) लागू कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में यह तत्काल रूप से प्रभावी हो गया। इसमें धारा-4 के अंतर्गत एक बोर्ड का गठन किया गया है।
एक्ट के गठन संबंधी प्रावधान व विशेषताएँ :
क. इसमें ‘जुवैनाइल’ से अभिप्राय है, वह बालक जिसने 16 वर्ष की आयु पूर्ण न की हो तथा वह बालिका जिसने 18 वर्ष आयु पूर्ण न की हो।
ख. जुवैनाइल अपराधी के सुधार हेतु प्रमुख सुधार गृह की व्यवस्था की गई, जिनमें उनके रहने, खाने तथा शिक्षा का पूर्ण प्रबंध किया गया साथ ही बालक के चारित्रिक विकास हेतु पूर्ण प्रशिक्षण की सुविधा का प्रावधान भी किया गया।
ग. आपराधिक जाँच के दौरान, किशोर बालक के रहने तथा देखभाल का प्रबंध करना राज्य सरकार का दायित्व है।
घ. इसी एक्ट के तहत एक कोर्ट का गठन किया गया, जिसमें एक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट तथा दो सम्माननीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का होना अनिवार्य हो। दोनों कार्यकर्ताओं में एक महिला कार्यकर्ता होनी चाहिए।
ङ. यदि कोई किशोर, परिवार के नियंत्रण से बाहर है, तो उसे धारा-15 तथा 16 के तहत तुरंत देख-रेख हेतु सुधार गृह में भेजने का प्रावधान है।
जुवेनाइल एक्ट – 2000 – यह एक्ट भी न्यून परिवर्तनों के उपरांत जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में एक साथ लागू हो गया। इस एक्ट में अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों को आधार बनाया गया था। एक्ट के गठन संबंधी प्रावधान एवं विशेषताएँ निम्न हैं –
क. संविधान की धारा-62 के तहत केन्द्र अथवा राज्य सरकार के परामर्श पर एक सलाहकार बोर्ड का गठन किया गया।
ख. धारा-34 के अंतर्गत राज्य सरकार या सामाजिक संगठन के संरक्षण के अनुरूप बाल-गृह का निर्माण किया गया।
ग. इस एक्ट में ‘जुवैनाइल’ से अभिप्राय उस बालक से है, जिसने अभी तक 18 वर्ष की आयु पूर्ण न की हो।
घ. जुवेनाइल के नियंत्रण हेतु धारा-63 के अंतर्गत ‘स्पेशल जुवैनाइल पुलिस यूनिट’ का गठन किया गया।
ङ. गठित कमेटी का मजिस्ट्रेट प्रत्येक 6 माह के उपरांत बालक के व्यवहार का निरीक्षण करेगा, ऐसी व्यवस्था की गई।
जुवेनाइल एक्ट – 2006 – यह एक्ट अंशतः 26 संशोधनों के उपरांत वर्ष 2006 में एक कानून बनाकर लागू कर दिया गया। एक्ट के तहत गठित प्रावधान एवं विशेषताएँ –
क. इस एक्ट के तहत जुवैनाइल बालक को दो वर्गों में विभाजित कर दिया गया। प्रथम वर्ग में वह बालक, जिसे सामान्य देखभाल की ही आवश्यकता है तथा द्वितीय वर्ग में कानून के तहत अपराधी बालक का निरीक्षण।
ख. बच्चे के मानसिक विकास हेतु ‘स्पेशल सुधार गृहों’ का निर्माण अनिवार्य किया गया।
ग. निरीक्षण गृहों का प्रावधान, जिसमें जाँच चलने तक जुवैनाइल को अस्थायी रूप से ठहराने का प्रावधान है। घ. अपराधी बालक की गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर ही बालक को गठित बोर्ड के समक्ष पेश करना अनिवार्य है।
ङ. बालक के अपराध के उपरांत कमेटी के एक अधिकारी द्वारा बालक के चरित्र तथा सामाजिक जाँच का प्रावधान किया गया, ताकि वास्तविक कारण का पता लगाया जा सके।
जुवेनाइल एक्ट की प्रासंगिकता :
प्रमुखतः जुवेनाइल बालक के मानसिक विकास के अनुरूप नियमित समय के अंतराल में शनैः शनैः आवश्यक परिवर्तन किया जाता रहा, परंतु विचारणीय का विषय यह है कि क्या यह संशोधन किसी सकारात्मक परिणाम का द्योतक साबित हुआ? कुछ मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक संगठन उस प्राचीन अवधारणा एवं मनोवृत्ति के आधार पर ही लचीले कानून एवं नियमों का गठन करते आए हैं जो यह मानती है कि 11-18 वर्ष तक मनुष्य का मानसिक विकास पूर्ण नहीं होता। जबकि वर्तमान समय में बालकों के मानसिक विकास में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिसके फलस्वरूप बालकों का बौद्धिक विकास कम आयु में भी तीव्र गति से होने लगा है। मनोवैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी वर्ग भी स्वीकार कर रहा है कि वर्तमान युवा वर्ग अल्प आयु में ही परिपक्व सोच के स्वामी बनते जा रहे हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि इस एक्ट में जरूरी संशोधन किया जाए।
बाल अपराध पूर्व में भी होते आए हैं, परंतु वहाँ सामान्य अपराध हेतु सामान्य दंड का प्रावधान है। जिसमें जुवैनाइल अपराधी को बाल सुधार गृह में सुधारने तथा 3 वर्ष की अधिकतम सजा का प्रावधान है, परंतु दिसम्बर, 2012 की एक अत्यंत लोमहर्षक घटना ‘निर्भया हत्या काण्ड’ ने पूरे हिंदुस्तान को झकझोर कर रख दिया। इस सामूहिक शारीरिक शोषण तथा नृशंसतापूर्ण हत्या ने इसे जघन्य अपराध की पृष्ठभूमि में रखते हुए इसे क्रूरतम अपराध माना, जिसमें सभी दोषियों को मृत्युदण्ड दिया गया, परंतु एक 16-17 वर्षीय अपराधी, जिसने इस घटना में अत्यंत निर्दयता की, उसे मात्र 3 वर्ष की सजा दी गई। तब यह प्रश्न जोर-शोर से उठा कि क्या वर्तमान एक्ट में संशोधन का अब अनुकूल समय है?
घटना के उपरांत अनेक बुद्धिजीवियों द्वारा उठाई गई आवाजों और मीडिया द्वारा इस विषय को प्रमुखता से उठाने के बाद यह विषय अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक बहस का मुद्दा बन गया। साथ ही इस एक्ट में संशोधन की आवश्यकता तत्काल ही महसूस की गई। यह प्रश्न उठा कि क्या इतने घोर घृणित अपराध को अंजाम देने वाले अपराधी को केवल किशोर होने का लाभ मिल जाएगा? क्या इससे उसका गुनाह कम हो जाएगा? भारत सरकार के इस लचीले कानून का लाभ तो अब आतंकवादी संगठन भी उठाने लगे हैं। भारतीय सीमा पर अनेक ऐसे आतंकवादी संगठन हैं, जो भारत के खिलाफ 15-18 वर्ष के बालकों को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल कर रहे हैं, क्योंकि वह भली-भांति परिचित हैं कि कितने ही घृणित अपराध के बावजूद यहाँ जुवैनाइल अपराधी को 3 वर्ष से ज्यादा का दण्ड नहीं दिया जा सकता।
जस्टिस जे. एस. वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। तब महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने यह सुझाव दिया कि हत्या व यौनाचार जैसे जघन्य अपराधों के अनुरूप अपराधी की आयु 16 वर्ष की जाए तथा सख्त सजा का प्रावधान किया जाए। भारतीय दंड संहिता 302, 326A, 376A तथा 376D के तहत जे. जे. (जुवेनाइल जस्टिस) आयोग इस पर निरीक्षण करेगा, जिसका प्रमुख कार्य होगा कि यह अपराध, क्यों तथा किन परिस्थितियों में हुआ इसका आंकलन करना और यदि अपराध जघन्य श्रेणी में आता है तो 7 वर्ष की सजा का प्रावधान होगा। इस आयोग ने एक्ट में संशोधन को आवश्यक माना तथा इसमें व्यापक परिवर्तन की रूपरेखा तैयार की गई। तदुपरांत एक जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का गठन किया गया तथा उसे यह अधिकार दिया गया कि 16-18 वर्ष के आयु वर्ग के ऐसे अपराधी, जिन्होंने जघन्य अपराध को अंजाम दिया है, उनके मामले में बोर्ड स्वयं निर्णय ले कि अपराधी को नियमित कोर्ट में भेजा जाए या बाल सुधार गृह में? तब ‘जुवेनाइल जस्टिस बिल-2014’ प्रस्तुत किया गया। बिल के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि हत्या व शारीरिक शोषण जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले अपराधी की आयु 16 वर्ष की जाए। अब चिंतनीय विषय यह है कि इस बिल के लागू होने के पश्चात् अपराधी को उम्र कैद या मृत्यु की सजा न होकर केवल 7 वर्ष की सजा का प्रावधान क्यों? जोकि जघन्य अपराध के आधार पर बहुत कम है। एक मानवाधिकारी कहते हैं कि बाल अपराधी को ज्यादा सजा न देकर उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए, परंतु इस बात की क्या गारंटी है कि सजा काटने के उपरांत वह पुनः इस प्रकार के अपराध को अंजाम नहीं देगा?
उपसंहार :
वास्तविकता यह है कि जब बालकों का मानसिक विकास तीव्र गति से हो रहा है, तब अत्यंत जघन्य आपराधिक मामलों में केवल आयु के कारण उसके अपराध को क्षमा करना, उस पीड़ित के साथ घोर अन्याय होगा, जिसने दर्दनाक हादसे को सहन किया हो। इस सम्पूर्ण घटना व विषय पर व्यापक चिंतन के उपरांत वर्तमान सरकार ने अंततः इस बिल को पास करके लागू तो कर दिया है। अब इस नए नियम के तहत जघन्य मामलों में 16 वर्ष या अधिक आयु को आधार मानकर अपराध का निर्णय किया जाएगा, हालांकि अब भी इसमें अधिकतम केवल 7 वर्ष की सजा का ही प्रावधान है। भारत एक विकासशील देश है तथा किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर होता है। भारत सरकार ने इस प्रकार के अपराधों की रोकथाम हेतु जो J.J. Act 2014 लागू किया है, उसका परिणाम क्या होगा? यह भविष्य के गर्भ में है, परंतु इसके बावजूद इस एक्ट के द्वारा इन नृशंस अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकेगा, ऐसी आशा की जाती है।
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