भारत का मुक्तिसंघर्ष : जनजातीय संघर्षों का योगदान

भारत का मुक्तिसंघर्ष : जनजातीय संघर्षों का योगदान
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प्रस्तावना :

अंग्रेजों के भारत में अपने विस्तार के साथ-ही-साथ अंग्रेजों का प्रखर विद्रोह भी प्रारम्भ हो गया था। इस विद्रोह में भारत की आदिवासी जातियों एवं जनजातियों के संघर्ष का आधुनिक भारत के इतिहास में अपना एक अत्यंत विशिष्ट योगदान है। इन जातियों का संघर्ष अन्य समुदायों की तुलना में अधिक तीखे एवं हिंसक होते थे। अपनी स्वतंत्रता की प्रेमी यह जातियाँ राज्य या सम्प्रदाय के लिए संघर्ष नहीं कर रही थीं। सामान्यतः अपनी दुनिया में मस्त रहने वाली ये जातियाँ मात्र इतना ही चाहती थीं कि बाहर के लोग उनके जीवन में दखल न दें। इन बाहरी लोगों को आदिवासी डिकू कहते थे। डिकू का सामान्य अर्थ है- परेशान करने वाले; जैसे; पूंजीवादी, साहूकार आदि। ब्रिटिश शासन के दौरान आने वाले परिवर्तनों ने आदिवासी शोषण तथा आदिवासी और डिकू के मध्य अंतर्विरोध को और तीखा कर दिया।

 

अपने जनजीवन पर बढ़ते हुए बाहरी दबाव का उत्तर आदिवासियों ने सशस्त्र संघर्ष के रूप में दिया था।

 

महत्त्वपूर्ण आदिवासी संघर्ष :

अंग्रेजों के विरुद्ध भारत में होने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण आदिवासी संघर्ष निम्नलिखित थे –

→ चेर एवं मुण्डा विद्रोह : 1817 में चेर तथा मुण्डा जनजातियों ने विद्रोह किया। यह विद्रोह मूलतः साम्राज्यवाद विरोधी थे तथा उन जमींदारों के पक्ष में किए गए थे जो अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति का शिकार होकर अपने अधिकार और अपनी शक्ति खो चुके थे।

→ होस विद्रोह : 1820-21 में होस जनजाति के लोगों ने साहूकारों, जमींदारों तथा अंग्रेजी राज्य की नीतियों के विरोध में विद्रोह किया। किंतु वे ब्रिटिश सरकार द्वारा पराजित कर दिए गए और विवशतः उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि वे जमींदारों को कर देंगे। बाहरी क्षेत्र के लोगों के अपने क्षेत्र में बसने का विरोध नहीं करेंगे तथा अंग्रेजों को अपना शासक मानेंगे।

→ मुण्डा उराव विद्रोह : बढ़ते हुए सरकारी टैक्सों तथा अफीम की खेती के विरोध में 1831-32 में छोटा नागपुर के आदिवासियों ने मुण्डा, उराव महाली आदि ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। यह संघर्ष कम-से-कम पाँच माह तक चला था। इस एकजुट संघर्ष में चार हजार के लगभग मकान तथा कई कचहरियों को जला दिया गया था। यद्यपि कि यह संघर्ष सफल नहीं हुआ था किंतु अंग्रेजी शासन को आदिवासी क्षेत्र के लिए विशेष व्यवस्था करने की जरूरत का एहसास करा दिया। क्षेत्र को ‘विनियम रहित क्षेत्र’ घोषित करके उसकी एक अलग इकाई ‘दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी’ के नाम से बना दी गई। 

 

→ छोटा नागपुर क्षेत्र का संथाल विद्रोह : यह विद्रोह उस समय हुआ था जब सम्पूर्ण भारत ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंगड़ाई होने का प्रयत्न कर रहा था। सन् 1855 से 1857 के मध्य चले इस विद्रोह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। संथाल मुख्य रूप से पूर्वी भारत की एक महत्त्वपूर्ण जनजाति थी। ये जनजातियाँ प्रमुखतः छोटा नागपुर क्षेत्र में निवास करती थीं। छोटा नागपुर का यह क्षेत्र 19वीं सदी के आरंभ से ही जनजातीय संघर्ष का केंद्र बन गया था। इस क्षेत्र का सबसे व्यापक संघर्ष 1855-57 के काल में हुआ। यह संथाल जनजाति का विद्रोह था। पहाड़ और जंगल में रहने वाले संथाल अपने इलाकों में मैदानी लोगों के लगातार प्रवेश करने से चिंतित थे। उनकी इस चिंता का कारण भी गलत नहीं था। मैदानी क्षेत्र से आने वाले ये लोग अपने साथ अनेक अन्य समस्याएँ लेकर आते थे। वे सामान्यतः अपने को आदिवासियों की अपेक्षा ज्यादा श्रेष्ठतम मानते थे, परिणामस्वरूप यदा-कदा वे आदिवासी जनजातियों का अपमान भी करते थे। जंगल के जिन पहाड़ी क्षेत्रों को साफ करके तथा अपना खून-पसीना बहाकर आदिवासियों ने खेती के योग्य बनाया था उन पर बाहर से आए इन लोगों ने अपना अधिकार कर लिया। अब उस जमीन पर बाहरी जमींदारों का अधिकार हो गया था। उनसे न सिर्फ उनकी जमीनें छीन ली गईं बल्कि उन पर राजस्व का बोझ भी लाद दिया गया। यह बढ़ता हुआ राजस्व उनको लूट रहा था। सरकारी लगान व अन्य करों के भुगतान के लिए वे दिन-प्रतिदिन क्रूरतम् महाजनी शोषण के शिकार होते जा रहे थे। इस क्षेत्र में रेलवे के विकास होने के साथ वे रेलवे निर्माण के कार्यों में बतौर मजदूर लग गए परंतु यहाँ पर भी उन्हें शोषण का शिकार ही बनाया गया, उन्हें अन्य मैदानी लोगों की तुलना में मजदूरी कम दी जाती थी। आर्थिक लूट और शोषण के इन विभिन्न रूपों का शिकार होने के साथ-साथ ही उन्हें निर्मम पुलिस दमन एवं उत्पीड़न का शिकार भी बनाया गया।

 

इस उत्पीड़न और अत्याचार ने संथालों के मन में अंग्रेजों एवं अंग्रेजों के पक्षधरों के विरुद्ध घोर घृणा का भाव भर दिया। आवश्यकता थी तो बस एक नेतृत्व करने वाले की। सीदो ओर कान्हू के रूप में उन्हें दो नेता भी प्राप्त हो गए। इन नेताओं ने जनता को ये विश्वास दिलाया कि अंग्रेजी राज्य का अंत अवश्यम्भावी है तथा अंग्रेज एवं उनका साथ देने वाले लोग गंगा नदी के उस पार लौट जाएँगे। सीदो ने कहा कि- ‘संघर्ष करने का आदेश उन्हें ठाकुरजी (ईश्वर) ने दिया है। ठाकुर जी ने मुझे आदेश देते समय कहा कि यह देश साहबों का नहीं है। ठाकुर जी खुद हमारी तरफ से लड़ेंगे।’ सीदो की इस भविष्यवाणी ने आम जनता में जोश और प्रेरणा की ऊर्जा भर दी। संथालों ने एक बड़े विद्रोह की योजना तैयार कर ली। विभिन्न गाँवों में संदेश भेजकर वहाँ की जनता को विद्रोह में सम्मिलित होने के लिए कहा गया। इसके बाद सशस्त्र संथालों ने साहूकारों के ऊपर हमला कर दस्तावेजों को जलाने, मैदानी लोगों के कब्जे में जो उनके खेत थे उनमें खड़ी फसलों में आग लगाने का तथा रेलमार्गों के निर्माण कार्य में तोड़-फोड़ का कार्य शुरू कर दिया।

 

साम्राज्यवादी शक्ति के सामने अंततः संथाल सफल नहीं हो पाए। उनके विद्रोह को अत्यंत क्रूरता के साथ कुचल दिया गया। इस दमन में उन्हें स्थानीय साहूकारों, जमींदारों एवं राजा-रजवाड़ों का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ था। संथाल प्रदेश को 1855 में विनियम रहित क्षेत्र घोषित कर दिया गया।

 

उपसंहार :

संथालों की पराजय मात्र संथालों की पराजय नहीं थी। यह शोषकों द्वारा शोषितों पर विजय थी। परंतु पराजित होने के बाद भी संथालों ने अंग्रेजों एवं साहूकारों-जमींदारों के मन में एक भय की उत्पत्ति तो कर ही दी। इस विद्रोह के समापन के मात्र दो वर्ष के अंदर ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम युद्ध ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ प्रारम्भ हो गया था।

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